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अच्छी बारिश, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना को लेकर कल मनाई जाएगी उज्जैनी, घरों में नहीं जलेगा चूल्हा, खेतों में बनेगा भोजन, इंद्रदेव और खेड़ा देवत का होगा पूजन

सरवानिया महाराज - नगर को परंपराओं की धरोहर कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्हीं परंपराओं में से एक है उज्जैनी (खेड़ा देवत पूजन), जिसका आयोजन अच्छी वर्षा, सुख-समृद्धि और गांव की खुशहाली की कामना के साथ किया जाता है। आगामी रविवार को नगरवासी वर्षों पुरानी इस लोक परंपरा का श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ निर्वहन करेंगे। इस दिन नगर के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलेगा। सभी परिवार अपने-अपने खेतों, कुओं अथवा गांव के बाहर भोजन बनाकर इंद्रदेव एवं खेड़ा देवत की पूजा-अर्चना करेंगे। उज्जैनी से एक दिन पूर्व शनिवार को परंपरा के अनुसार नगर के किसान अपने-अपने मवेशियों को जोड़ेश्वर श्याम मंदिर लेकर पहुंचे। यहां मवेशियों की परिक्रमा करवाई गई और उनके सुख, स्वास्थ्य तथा रोग-दोष से रक्षा की कामना की गई। मान्यता है कि इस परंपरा के पालन से पशुधन सुरक्षित रहता है तथा इंद्रदेव की कृपा से क्षेत्र में अच्छी वर्षा होती है, जिससे किसानों की फसलें लहलहाती हैं और समृद्धि आती है। ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा कब से चली आ रही है, इसकी स्पष्ट जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन पीढ़ियों से इसका निर्वहन लगातार होता आ रहा है। मान्यता है कि उज्जैनी पर खेड़ा देवत का पूजन करने से इंद्रदेव प्रसन्न होते हैं और क्षेत्र में भरपूर वर्षा होती है, जिससे खेतों में अच्छी पैदावार होती है। साथ ही लोग अपने परिवार और मवेशियों के निरोगी एवं सुखी रहने की भी कामना करते हैं। परंपरा के अनुसार उज्जैनी मनाने का दिन नगर के किसान और वरिष्ठजन आपसी सहमति से तय करते हैं। इसके बाद पूर्व संध्या पर लाउड स्पीकर द्वारा पूरे नगर में सूचना दी जाती है कि शनिवार को सभी अपने अपने पशुओ को श्री जोड़ेश्वर श्याम मंदिर पर परिक्रमा दिलवा कर अपने पशुओं के स्वास्थ्य की मंगल कामना के साथ अगले दिन सभी घरों से बाहर भोजन बना कर पूजा अर्चना करेंगे, तथा किसी भी घर में भोजन नहीं बनाया जाएगा। निर्धारित दिन सुबह नगर की परिक्रमा निकाली जाती है। इस दौरान गोमूत्र का छिड़काव करते हुए विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिरों में सिंदूर, धूप-दीप से पूजा-अर्चना कर ध्वज चढ़ाए जाते हैं तथा सभी देवी-देवताओं को पूजन में आमंत्रित किया जाता है। इसके बाद सभी परिवार अपने-अपने खेतों, कुओं अथवा गांव के बाहर पहुंचकर चूरमा, बाटी और दाल तैयार करते हैं। महिलाएं भोजन बनाने का कार्य करती हैं, जबकि पुरुष भी इसमें सहयोग करते हैं। भोजन तैयार होने के बाद इंद्रदेव, खेड़ा देवत एवं अन्य देवी-देवताओं को चूरमे का भोग अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात पूरा परिवार एक साथ बैठकर प्रसादी ग्रहण करता है। आज भी यह परंपरा ग्रामीण अंचलों में पूरी आस्था और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। भले ही शहरों में इसका प्रचलन धीरे-धीरे कम हो रहा हो, लेकिन अपने गांव से जुड़े अनेक परिवार इस अवसर पर अपने पैतृक गांव लौटकर इस अनूठी लोक परंपरा का हिस्सा बनते हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखते हैं।

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